सिर्फ गया में हीं नहीं देश के इन जगहों पर भी पितरों का किया जाता है पिंडदान

वैसे तो बिहार के शहर गया में पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों का पिंडदान करने का सबसे उपयुक्‍त स्‍थान माना गया है। भारतीय मान्‍यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म करना अत्‍यंत पवित्र कर्म है। पितृपक्ष में मृत माता-पिता का उनकी संतान द्वारा श्राद्ध किया जाता है, परंतु गया में श्राद्ध का विशेष महत्व है। वैसे तो श्राद्ध शास्त्रीय समय निश्चित है, परंतु ‘गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं’ कहकर वहां हमेशा पिंडदान करने की अनुमति दी गई है। इसके अतिरिक्‍त गया के अलावा भी भारत में 55 श्राद्ध तीर्थ बताये गए हैं जिनमें से तीन का सर्वाधिक महत्‍व है।  उत्तराखंड के बद्रीनाथ में ब्रह्माकपाल पर पिंडदान किया जा सकता है। कहते हैं कि यहां पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को नरकलोक से मुक्ति मिल जाती है। स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्मकपाल का पिंडदान गया से आठ गुणा अधिक फलदायी श्राद्ध तीर्थ है। इसी स्‍थान पर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिव जी ने भी प्रायश्‍चित किया था।इसके अतिरिक्‍त हरिद्वार भी पिंडदान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हरिद्वार में नारायणी शिला पर पिंडदान का महात्‍म्‍य बताया जाता है। इसीलिए पितृ पक्ष में हरिद्वार में भी बहुत से लोग आकर अपने पुरखों के लिए पिंडदान करते हैं। जहां हरिद्वार की गंगा में डुबकी लगाने ने पाप से मुक्‍ति मिलती है वहीं यहां पिंडदान करने से पित्तरों को मोक्ष मिलता है। साथ ही घर परिवार में सुख-शांति आती है। काशी में पिंड दान करने का अपना अलग ही महत्त्व है। पुराणो के अनुसार काशी में पिंड दान करना अनिवार्य कहा जाता है। यहां पिंडदान करने से पितरों की विभिन्‍न योनियो मुक्ति और प्रेत स्‍थिति से मोक्ष प्राप्ति होती है।

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