मिथिला विश्वविद्यालय की उपेक्षा अब स्वीकार नहीं : रजनीकांत पाठक

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दूरगामी सोच और सुस्पष्ट नीति के अभाव की वजह से बिहार का शिक्षा तंत्र पूर्णतः पंगु और चौतरफा लाचार दिख रहा है।ऐसी बात नहीं है कि जिस मामले की ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट कराने जा रहा हूं वह मामला सरकार के संज्ञान में नहीं है फिर भी उसके तंत्र की अकर्मण्यता का खामियाजा हमें और आपको भुगतना पड़ रहा है।एक तरफ बिहार सरकार ने नौकरी के साथ-साथ अध्ययन करके प्रमाण पत्र लेने का प्रावधान बनाया है और उस प्रमाण पत्र के सहारे पदोन्नति देने की घोषणा भी कर रखी है लेकिन दूसरी तरफ नियमित सत्र से वंचित छात्रों के साथ साथ नौकरी पेशा वालों के लिए अध्ययन करते हुए प्रमाण पत्र पाने का एक मात्र साधन दूरस्थ शिक्षा आज बंद होने के कगार पर है।यह नौकरी पेशा वालों के समक्ष एक यक्ष प्रश्न है लेकिन फिर भी सरकार गूंगी और बहरी बनी हुई है।इस स्थिति में उसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक ही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग रोज-रोज नई-नई बिना सिर पैर के अधिसूचना जारी करती रहती है जिसकी वजह से मिथिला विश्वविद्यालय के अंतर्गत चलने वाले दूरस्थ शिक्षा निदेशालय आज बंद होने के कगार पर पहुंच गया है।सरकार की लापरवाह नीतियों की वजह से अनगिनत छात्रों का भविष्य अंधकार के सुरंग में जीने को अभिशप्त है।निम्न आय वर्ग वाले,काफी मशक्कत से नौकरी प्राप्त करने वाले वैसे लोग जो नौकरी करते हुए अध्ययन करते थे और प्रमाण पत्र के सहारे पदोन्नति की आस लगाए हुए थे के साथ साथ वैसे छात्र जिन का नामांकन रेगुलर मोड में नहीं हो पाता था और थक हार कर दूरस्थ शिक्षा में अपना नामांकन कराते थे, उन लोगों में घोर मायूसी छाई हुए है।इस ज्वलन्त और छात्रहित से जुड़े इस मुद्दे के लिए ना तो शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए एमएलसी, सांसद और न ही बिहार सरकार कोई सार्थक पहल कर रही है जो वाकई चिंतनीय और शर्मनाक है।इसी उपेक्षा की वजह से लोगों की सिस्टम और सरकार से नाराजगी है।

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अब सिस्टम के एक और विद्रूप रूप से आपको इस उदाहरण के जरिए बताने की कोशिश करता हूं।हमें सामूहिक पहल करने की सख्त आवश्यकता है।बेगूसराय,समस्तीपुर, दरभंगा और मधुबनी इन चारों जिले में पीजी की पढ़ाई कुछ एक महाविद्यालय में ही होती है।उदाहरण स्वरूप हम बेगूसराय जिले को ही लें तो देखते हैं कि जीडी कॉलेज, कोऑपरेटिव कॉलेज,महिला कॉलेज, एपीएसएम कॉलेज, मंझौल कॉलेज,बीहट कॉलेज टीआई कॉलेज:इन महाविद्यालयों से हजारों की संख्या में छात्र प्रति वर्ष अलग-अलग प्रतिष्ठा विषयों से स्नातक उत्तीर्ण होते हैं।अब मान लिया जाए कि एक कॉलेज में अगर स्नातक की पढ़ाई इतिहास ,मनोविज्ञान ,राजनीति शास्त्र, दर्शन शास्त्र, हिंदी, अंग्रेजी, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान,रसायन शास्त्र,भौतिकी और गणित विषय में होती है तो संबंधित कॉलेज से लगभग 15 छात्र स्नातक उत्तीर्ण होते हैं लेकिन उनके लिए स्नातकोत्तर एकमात्र जीडी कॉलेज ही विकल्प बचता है।कई छात्र संगठन अपने आंदोलनों द्वारा पीजी पढ़ाई की मांग प्रखंड एवं अनुमंडल स्तरीय महाविद्यालय में कराने की मांग कर रहे हैं लेकिन उन मांगों की उपेक्षा से युवा पीढ़ी का भविष्य ही चौपट हो रहा है। अब जिन का नामांकन रेगुलर मोड के महाविद्यालयों में नहीं होता था तो वैसे कला के छात्र अधिक पैसा लगा कर के दूरस्थ शिक्षा में नामांकन लेते थे और परीक्षा देकर प्रमाण पत्र प्राप्त करते थे लेकिन 6 सितंबर 2018 की अधिसूचना के अनुसार जून 2020 तक नैक टीम के द्वारा जांच करवा कर 4 बिंदु पर 3.26 अंक प्राप्त करने को कहा गया है और इसके साथ ही अधिसूचना में यह भी स्पष्ट कहा गया है कि अगर यह शिक्षण संस्थान 3.26 अंक प्राप्त नहीं करते हैं तो उन्हें आगे की स्वीकृति प्रदान नहीं की जाएगी।यहां आश्चर्य की बात यह है कि 6 जून 2019 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव रजनीश जैन ने अधिसूचना जारी करते हुए इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय अधिनियम 1985 के तहत इस नियमों के अधीन ना लाते हुए इग्नू को इसकी छूट दे रखी है।इस स्थिति में इसे विडंबना ही कहा जाए कि बिहार के दूरस्थ शिक्षा को देखने वाला कोई नहीं है जबकि 6 फरवरी 2018 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने अधिसूचना में स्पष्ट उल्लेखित किया है कि उक्त नियमों और इनके क्रियान्वयन में आने वाली समस्या एवं कठिनाई को दूर करने के लिए भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पास अधिकार सुरक्षित रहेगा। अब सवाल यह उठता है कि जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार के पास इसमें संशोधन के लिए अधिकार सुरक्षित है तो बिहार के मिथिला विश्वविद्यालय के अंतर्गत चलने वाले दूरस्थ शिक्षा निदेशालय को इस 3 पॉइंट 26 से मुक्त क्यों नहीं किया जाता है?

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बिहार सरकार इस दिशा में कोई ठोस और सार्थक पहल क्यों नहीं करती है?ये उपेक्षा आखिर हमारा युवा पीढ़ी क्यों सहन करे? जबकि सबको पता है कि मिथिला का अधिकांश क्षेत्र नेपाल के द्वारा छोड़े गए पानी के कारण बाढ़ से प्रभावित रहता है।दूरस्थ शिक्षा निदेशालय का जहां भी अध्ययन केंद्र है वह कोई नगरीय,शहरीय या औद्योगिक क्षेत्र नहीं है बल्कि गांव,ग्रामीण और कृषि क्षेत्र है।इस स्थिति में दूरस्थ शिक्षा निदेशालय दरभंगा को छूट क्यों नहीं देती है।इस उपेक्षा और दोहरेपन का आखिर जिम्मेवार कौन है?
यह निर्विवाद सत्य है कि संघर्ष से ही इच्छित लक्ष्य को भेदा जा सकता है इसलिए आइए एक बार फिर याज्ञवल्क्य की भूमि गार्गी और मैत्री की तपोभूमि की पुनः प्रतिष्ठा वापस दिलाने का हम सामूहिक प्रण लें।हम मानव संसाधन मंत्रालय का ध्यान इस ज्वलंत मुद्दे की ओर न केवल आकृष्ट कराएं बल्कि समाधान तक अनवरत प्रयास करते रहें ताकि युवाओं को अपना भविष्य गढ़ने में किंचित मात्र भी परेशानी नहीं हो।
( लेखक दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से स्वतंत्र प्रत्याशी हैं)

 

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