काल भैरव जयंती 16 नवंबर 2022 महत्व

श्री काल भैरव अष्टमी🐶🐶
🐕‍🦺🐕‍🦺 विशेष🐕‍🦺🐕‍🦺
🚩🕉️काल भैरव जयंती 16 नवंबर को, जरूर करें ये काम. 16 नवंबर को काल भैरव की जयंती, काल भैरव की जयंती के दिन भगवान शिव को पांचवें रुद्र रूप काल भैरव की पूजा की जाती है।*

🚩🌹ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन काल भैरव का जन्म हुआ था। काल भैरव की जयंती काला अष्टमी को मनाई जाती है। कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली अष्टमी को काला अष्टमी भी कहा जाता है।

🚩🌹काल भैरव जयंती 16 नवंबर 2022 महत्व

🚩🌹मान्यता है कि इस दिन काल भैरव की पूजा करन से सभी पाप दूर हो जाते हैं। साथ ही भय और रोगों से भी छुटकारा मिल जाता है। भगवान शिव ने काल भैरव का काशी का कोतवाल नियुक्त किया था।

🚩🌹काल भैरव जयंती पर जरूर करें ये काम

-🚩🌹काल भैरव की विधि-विधान से पूजा करें।

-🚩🌹भगवान शिव की भी विशेष पूजा करें

-🚩🌹काल भैरव चालीसा का पाठ करें।

-🚩🌹किसी काले कुत्ते को खाना खिलाएं।

-🚩🌹व्रत रहें और सरसो के तेल आदि का दान करें।

-🚩🌹इस दिन कुत्ते का अनादार बिल्कुल भी अनादर न करें।

🚩🌹मान्यता के अनुसार काल भैरव जयंती पर ऐसा करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही मनोकामनाएं भी पूरी होती है।
🚩🕉️पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव के क्रोध से ही काल भैरव का जन्म हुआ था।

🚩🕉️काल भैरव जयंती की पौराणिक कथा

🚩🕉️पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव, भगवान विष्णु औ ब्रह्मा जी में इस बात की बहस छिड़ी थी कि तीन में सबसे श्रेष्ठ कौन है। जब फैसला नहीं हो पाया तो बात ऋषियों के पास पहुंची और भगवान शिव को सबसे श्रेष्ठ बताया। जिसके बाद ब्रह्मा जी ने क्रोध में आकर भगवान शिव को अपशब्द बोला दिया, जिसके बाद भगवान शिव क्रोधित हो गए और काल भैरव का जन्म हुआ। काल भैरव में ब्रह्मा जी के एक सिर को काट दिया। जिसके बाद काल भैरव को ब्रह्मा हत्या का पाप लगा।

🚩🕉️उन्हें इस पास से मुक्ति के लिए भगवान शिव ने उन्हें तीर्थ यात्रा करने का आदेश दिया। जब वह काशी पहुंचे तो वह दोष मुक्त हुए और काशी में ही बस गए। कहा जाता है कि इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें काशी के कोतवाल की उपाधि दी।

🚩🕉️भारत में भैरव के प्रसिद्ध मंदिर

🚩🕉️भारत में भैरव के प्रसिद्ध मंदिर हैं जिनमें काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ाखाल का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहाँ गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। उत्तराखंड चमोली जिला के सिरण गाँव में भी भैरव गुफा काफी प्राचीन है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है। जयगढ़ के प्रसिद्ध किले में काल-भैरव का बड़ा प्राचीन मंदिर है जिसमें भूतपूर्व महाराजा जयपुर के ट्रस्ट की और से दैनिक पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक-पुजारी नियुक्त हैं।

🚩🕉️जयपुर जिले के चाकसू कस्बे मे भी प्रसिद बटुक भैरव मंदिर हे जो लगभग आठवी शताब्दी का बना हुआ हे मान्यता हे की जब तक कस्बे के लोग बारिश ऋतु से पहले बटुक भैरव की पूजा नहीं करते तब तक कस्बे मे बारिश नहीं आती ।

🚩🌺मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम अदेगाव में भी श्री काल भैरव का मंदिर है जो किले के अंदर है जिसे गढ़ी ऊपर के नाम से जाना जाता है।

🚩🌺कहते हैं औरंगजेब के शासन काल में जब काशी के भारत-विख्यात विश्वनाथ मंदिर का ध्वंस किया गया, तब भी कालभैरव का मंदिर पूरी तरह अछूता बना रहा था। जनश्रुतियों के अनुसार कालभैरव का मंदिर तोड़ने के लिये जब औरंगज़ेब के सैनिक वहाँ पहुँचे तो अचानक पागल कुत्तों का एक पूरा समूह कहीं से निकल पड़ा था। उन कुत्तों ने जिन सैनिकों को काटा वे तुरंत पागल हो गये और फिर स्वयं अपने ही साथियों को उन्होंने काटना शुरू कर दिया। बादशाह को भी अपनी जान बचा कर भागने के लिये विवश हो जाना पड़ा। उसने अपने अंगरक्षकों द्वारा अपने ही सैनिक सिर्फ इसलिये मरवा दिये किं पागल होते सैनिकों का सिलसिला कहीं खु़द उसके पास तक न पहुँच जाए।
🚩🌺भारतीय संस्कृति प्रारंभ से ही प्रतीकवादी रही है और यहाँ की परम्परा में प्रत्येक पदार्थ तथा भाव के प्रतीक उपलब्ध हैं। यह प्रतीक उभयात्मक हैं – अर्थात स्थूल भी हैं और सूक्ष्म भी। सूक्ष्म भावनात्मक प्रतीक को ही कहा जाता है -देवता। चूँकि भय भी एक भाव है, अत: उसका भी प्रतीक है – उसका भी एक देवता है और उसी भय का हमारा देवता हैं- महाभैरव

*🚩🌺कालभैरव का मंदिर जयपुर जिले की पावटा तहसील के एक गांव पांचुड़ाला में स्थित है

संतोष पाठक

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