जाने भारत के महापर्व “छठ पूजा” के बारे में

भारत पर्वों, व्रतों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों का देश है. यहां शायद ही ऐसा कोई महीना बीतता हो जिसमें कोई व्रत या पर्व न पड़ता हो. हमारे पर्वों में सबसे अलग बात यह होती है कि इन सबमें हमारा उत्साह किसी न किसी आस्था से प्रेरित होता है.
ऐसे ही त्योहारों की कड़ी में पूर्वी भारत में सुप्रसिद्ध “छठ पूजा” का नाम भी प्रमुख रूप से आता है. बिहार के पटना घाट से लेकर दिल्ली के यमुना घाट समेत और भी तमाम छोटे-बड़े घाटों पर प्रत्येक वर्ष छठ का भव्य आयोजन होता है. शुरुआती समय में छठ अधिकाधिक रूप से सिर्फ बिहार तक सीमित था, पर समय के साथ मुख्यतः लोगों के भौगोलिक परिवर्तनों के कारण इस पर्व का प्रसार बिहार से सटे प्रदेशों में भी होता गया.
भारत में बिहार समेत यूपी, झारखंड व नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी बड़े धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है. इसके अतिरिक्त छिटपुट रूप से तो इसका आयोजन समूचे भारत में और विदेशों में भी देखने को मिलता है.
रोशनी के त्योहार, “दिवाली” से छह दिन बाद और ” भैयादूज” के तीसरे दिन से छठ महापर्व आरम्भ होता है. पहले दिन ( नहाए खाए के दिन ) सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है. अगले दिन से उपवास आरम्भ होता है. व्रति दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब पाँच बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं. तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं. अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं. पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित होता है. जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ भक्तिगीत गाये जाते हैं. अंत में लोगो को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं. जिसे पारण का नाम दिया गया है.
“छठ” महापर्व सूर्य देव को समर्पित है. सूर्य संसार के सभी जीवों को प्रकाश देते हैं. पौराणिक कथाओं के मुताबिक” छठ माता” (छठी मैया) संतानों की रक्षा करती हैं. उन्हें लंबी उम्र, आरोग्य प्रदान करती हैं. हिंदू धर्म में षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानस पुत्री माना गया है. उन्हें “माँ कात्यायनी” भी कहा जाता है. उनकी नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर पूजा होती है.
छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष, इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है. भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है.
शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना की पद्धति है. इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है. इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की. जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है. इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है. नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता. इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है. यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है.

Report By: Digvijay kr.

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