जाने बांग्ला भाषा का इतिहास

मेरे पिता,मेरे गुरु़-स्वर्गीय अनंत गोपाल दत्ता के कर कमलों में प्रणाम ।

आज का विषय – बांग्ला लिपि का इतिहास।

बांग्ला लिपि का आविर्भाव और विकास के संबंध में भी कई मत है। कुछ पूरालिपिविद के अनुसार बांग्ला लिपि के अक्षर नगरी लिपि से मिलते हैं अर्थात इसका संबंध मगध राज्य के लिपियों से मानते हैं। कुछ पूरालिपिविद आठवीं सदी तक के कुटिल लिपि में बांग्ला लिपि का इतिहास खोजने का प्रयत्न कर रहे हैं । साधारण मत पर यह है कि भारत के सभी लिपियां ब्राह्मी लिपि से निकली है और 10 वीं शताब्दी के आसपास सभी लिपियां एक दूसरे से दूर होती गई । हम बांग्ला लिपि का विकास को आठवीं शताब्दी में पाल राजाओं के शासन काल से मान सकते हैं। 9 वीं शताब्दी के स्तंभलेखो में कुछ अक्षर बांग्ला जैसे मिलते हैं। इसी समय से धीरे-धीरे बांग्ला लिपि का विकास होता गया जिसका प्रमाण 11वीं शताब्दी के लेखों में मिलते हैं। 12 वीं शताब्दी में बांग्ला लिपि अपना स्वतंत्र रूप ग्रहण करने लगी। 12 वीं शताब्दी के प्रसिद्ध अभिलेख 1170 कि “बुद्धगया लेख”, 1175 की “गदाधर मंदिर लेख”, राजा गोपाल तृतीय के समय का “मंदा लेख” और बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन के “तर्पणादिघी दानपात्र”, “मघई नगर शिलालेख”, “ढाका मूर्तिलेख” और कुछ हस्तलिपि जैसे “पंचरक्षा”, “योगरत्नमाला” ,”गृह्मावलि विवृत्ति” आदि में मिलते हैं।

आभार:Kakoli Mehrotra

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