लोकल इज़ वोकल

मिट्टी से बने बर्तनो व दीपक की खूबसूरती चायनीज से बेहतर साबित हो रहा है. बात करे दीवाली और छठ जैसे त्योहारों का तो ये अपने संस्कृति और संस्कारो में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किये हैं. खास कर बिहार में दीवाली और छठ आते ही बाजार दुल्हन की तरह सज जाती है. मिट्टी के बने, दीया, रंग-बिरंगे खिलौने आदि से पूरा दिघवारा, सीतलपुर, गरखा बाजर पट गया है. कुम्हार के घरों की रौनक बढ़ गई है. चाहें कितना भी पैसे वाला क्यूँ ना हो मिट्टी का दीपक जलाये बिना उन्हें चैन नहीं आता. अपनी संस्कृति को बढ़ावा देना हमारा जीवन लक्ष्यों में से एक होना चाहिए इसे मानते हुए लोगों में आस्था और अपने संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक ये मिट्टी के दिये एक अनोखा एहसास दिलाती है. आधुनिकता के बीच, इनकी मांग में तनिक भी कमी नहीं हुई. इन दिनों लोग शौक़ से दिया, घरौंदा को सजाने के लिए मिट्टी के रंगीन बर्तन जिसे चूक्का कहते है खरीद रहे है.

वही कोरोना (कोविड-19) की बात की जाए तो लोग भयमुक्त दिख रहे हैं. तीस प्रतिशत लोग ही मास्क का प्रयोग कर रहे है और सामाजिक दूरी न होना, मज़बूरी बताया जा रहा है.

report by; Digvijay kr.

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