मेरा देश महान

सबसे न्यारा ,सबसे प्यारा ऐसा है देश हमारा,
ऋषिमुनियों के तप से सिञ्चित वसुधैव कुटुम्बकम निराला।

सिर पर सोहे मुकुट हिमालय सिंधु जिसके चरणों को धोए,
रंगबिरंगी वनस्पतियाँ इसकी बरबस ही सबके मन को मोहे।

वसन्त ,ग्रीष्म ,वर्षा ,शरद, हेमन्त अरु शिशिर,
भिन्न -भिन्न ऋतुओं से सुसज्जित अपना देश कितना विशिष्ट।

भिन्न भिन्न हैं रीति रिवाज सभी के फिर भी दिल में सबके बसते,
भाँति भाँति की सुगन्धितवनस्पतियां खोलतीदिलके द्वार सभीके।

मौसम केअनुरूप होती फसलें,भाँति- भाँति के फल हैं फलते,
रंग-बिरंगे पंछी इत -उत उड़ते मीठे स्वर में हैं वे गाते,

कलकल छल छल बहती नदियाँ मीठा राग सदा सुनाती,
हो मंत्रमुग्ध पावन धरा पर जन्म लेने दिव्यात्माएँ उतरतीं।

विश्व में न कोई हुआ देश भारत,हिन्द ,आर्यावर्त्त जैसा,
जिसकी संस्कृति से हो पल्लवित पूरा विश्व ही महका।

धन्य हुए हम भारतवासी हुआ जन्म ऐसी पावन धरा पर
है यह ऐसी वसुंधरा, लेते यहाँ जन्म मानव रूप मेंस्वयं परमपितापरमेश्वर।
माधुरी भट्ट

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