“शिक्षक”

एक ऐसा व्यक्तित्व जो अपना जीवन सामाज के लिए हमेशा समर्पित करते है . शिक्षा का वो जीवित मुरत जिसे लोग पूजते है. लोग स्वयं तो गुरु से ज्ञानार्जन करते ही है साथ ही अपने आने वाले पीढ़ी का भी ज्ञानार्जन का कामना करते है. समाज का हर संभव कार्य करने वाले वो व्यक्ति जो निःस्वार्थ भाव रखता हो शिक्षक की संज्ञा पाते है.
शिक्षक समाज का वह अभिन्न अंग जिसके बिना मानव जाति का कोई अहमियत नहीं रह जाती वो एक पशुमात्र रह जाएगा. सही गलत का फर्क समझाने वाला, वर्तमान और भविष्य के लिए हमेशा तैयार करने वाला, भेद-भाव से कोशों दूर, सहिष्णुता का प्रतीक, ईमानदार, कर्मठ जैसे कई सद्गुणों से ओतप्रोत, जितनी तारीफे की जाए कम ही लगता है.
जब भी कोई दिक्कतें आती है लोग बोलते है चलो मास्टर सहाब के पास. शिक्षक सच में मास्टर ही होते है, कोई भी क्षेत्र हो चाहे बच्चों का भविष्य निर्माणकर्ता का बात आये या फिर पोषककर्ता, नेतृत्वकर्ता, सामाजिक न्याय, या फिर कोई अन्य इनकी भूमिका अहम होती है. इनका स्वरुप कभी-कभी स्टेशन की तरह और बच्चों का स्वरुप ट्रेन की तरह दिखता है. ऐसा इसलिए कि शिक्षक अपने आपको वही रखे रखते है और बच्चें उनके पास से ज्ञान का भंडार लिए अपने लक्ष्य को हासिल कर जाते है. जैसे एक ट्रेन प्लेटफॉर्म से गुजर कर अपने लक्ष्य तक पहुँचता है. एक शिक्षक कई अन्य शिक्षकों का निर्माणकर्ता होते है और तो और अभियंता, डॉक्टर, सैनिक, नेता जैसे कई क्षेत्रों में अपना योगदान देते है. मतलब साफ़ है, सामाजिक रूप से माता-पिता और शिक्षक सिक्के के दो पहलू हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा है.
कहा गया है, “गुरु बिना ज्ञान नहीं ”
बिल्कुल, ये तो शत प्रतिशत सही है कि गुरु बिना ज्ञान नहीं. क्यूंकि इन दिनों सोशल मीडिया सभी पर एक ऐसा दुष्प्रभाव छोर रहा है मानो कि मशीनीकरण ही सब कुछ है, लेकिन ये मशीन बनाने वाला भी एक मानुष ही है ये हम भूलते जा रहे है. वास्तुतः हम कह सकते है कि शिक्षक और बच्चों के बीच आभासी सम्बंध ही देखने को मिल रहा है. जो संबंध दिल से निभाया जाता रहा है उसे आज हम दिमाग़ से निभा रहे है. गुरु-शिष्य का एक ऐसा पवित्र रिश्ता जो आदि काल से ही अमर रहा है, चाहे वो विश्वामित्र और भगवान राम- लक्ष्मण ,द्रोणाचार्य-एकलव्य, या
राक्षसो के देवता माने जाने वाले गुरु शुक्राचार्य हो गुरु अपने शिष्य को हमेशा देते ही रहे है. ये एक निःस्वार्थ सम्बंध को इंगित करता है जिसे कायम रखने की जरूरत है.

एक पौराणिक प्रेरक कहानी में कुछ ऐसा सीखने को मिला :
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस!

गुरु चाहे गूंगा हो, चाहे गुरु बाबरा(पागल) हो गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए. गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा, अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते.

दिग्विजय की कलम से 🙏

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