मैडम भीकाजी कामा की जयंती पर श्रद्धांजलि

जन्म लेते हैं ऐसे व्यक्तित्व इस धरा पर,जो जीते हैं औरों केलिए,
ऐसे कर्मयोद्धा प्रेरणा स्रोत बन जाते है इस जग में सदा के लिए।

चौबीस सितम्बर सन अट्ठारह सौ इकसठ की है यह बात पुरानी।
मुम्बई के फ़ारसी परिवार में सोहराबजी फ्रामजी पटेल के घर जन्मी बिटियारानी।

देश के प्रति था अनुपम लगाव , करती नमन सदा देशभक्तों को, देश की आन बान और शान पर जो हुए कुर्बानभजती सदा उनको

राष्ट्र के प्रति निष्ठा, चर्मोत्कर्ष सेवा भाव बसा था कामा की रगों में,
अद्भुत साहस दिल में, भारत माता की स्वतंत्रता काजुनून साँसों में

देख बाला की अनन्य देशभक्ति ,हुए पिता चिंतित और गम्भीर,
मुम्बईकेमशहूर वकील रुस्तम के.आर.कामा सङ्ग ,
बाँधी फिर उनकी गृहस्थी की जंजीर।

स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहने की मिली सदा धमकियाँ पति से,
परन्तु मैडम कामा का जीवन तो ओतप्रोत था देशभक्ति से।

त्याग भोग- विलासिता , मिला आनन्द जीवन की सादगी में,
पाया सुकून सन1896 के मुंबई प्लेगग्रसित रोगियों कीसेवा में।

रोगियों की सेवा करते -करते स्वयं आई प्लेग की चपेट में,
देश के प्रति निष्ठा और सेवा भावने न जाने दिया मौत के मुँह में

भरी रही सदा भारतीय सभ्यता और संस्कृति के भावों से,
मिला उत्साह दूना वीर सावरकर और दादाभाई नौरोजी जैसे स्वतंत्रता सेनानियों से।
22अगस्त 1907को अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में,
किया प्रतिनिधित्व भारत का ,ज़र्मनी के स्टुटगार्ड में।

पहुँचते ही मंच पर किया सम्बोधित भरी सभा को,
है निवेदन हो जाएँ खड़े सभी,बढ़ाएँ भारतीय ध्वज की शान को।

ऐसे अद्भुत साहसी व्यक्तित्व का सबने सम्मान किया,
प्रथमबार अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय तिरंगा फहराया गया।

पेरिस में ‘बन्दे मातरम ‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया,
प्रथम विश्व युद्ध केसमय फ्रांसने उन्हें एक किले में नजरबंदकिया

धन्यहै ऐसी देशभक्तजिसने पैंतीस वर्षों कानिर्वासितजीवन जिया
अन्तिम साँस में भीवन्दे मातरम कहकर मातृभूमि कोनमनकिया

भारतभूमि की ऐसी मातृशक्ति को है नमन बारम्बार,
है नमन बारम्बार

आभार:

माधुरी भट्ट

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