इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे बडा पर्व बकरीद

इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे बडा पर्व बकरीद ..पर्व आस्था का जो हमें ये सिखलाती है कि हालात चाहे जो भी हों हमें यकीन रखना चाहिए अपने पैगम्बर पर ,अपने खुदा पर और उनके किये हर फैसले में छिपी हमारे लिए होने वाली रहमत पर और अल्लाह के नेकदिली पर ।
ईद अल-अज़हा या बकरीद (अरबी में عید الاضحیٰ; ईद-उल-अज़हा अथवा ईद-उल-अद्’हा – जिसका मतलब क़ुरबानी की ईद) इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है। रमजान के पाक महीने की खत्म होने के लगभग ७० दिनों बाद इसे मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार हज़रत इब्राहिम अल्लाहीस्लाम अपने बेटे हज़रत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उसके बेटे को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह त्योहार मनाया जाता है। अब इस कुर्बानी का रुप बदल दिया गया और अब ज्यादातर बकरे ,भेंड ,ऊँट ,डूम्बा और अन्य बडे जानवरों की कुर्बानी दी जाती है ताकि परवरदिगार की रहमत पुरे परिवार पर बरसती रहे ।


एक तरह से यह त्योहार हमें हर तरह की कुर्बानी की सीख देती है । और इसी कुर्बानी की सीख को ध्यान में रखते हुए दानापुर बँगला नम्बर दो में रहने वाले जानेमाने डॉक्टर तनवीर अख्तर ने अपने पुरे परिवार के साथ साथ जरूरतमंद लोगों के बीच भी मिठाइयों का वितरण किया और बकरे की कुर्बानी दे कर अपने परिवार और अपने जानने वालों की सलामती की दुआ माँगी । परिवार के नन्हे मुन्ने सदस्यों शायान ,शाहान ,अब्दुल्ला और अजलान ने भी इस इबादत में हिस्सा लिया । जहाँ एक ओर उन बच्चों मासूम शरारतें एक अलग ही शमाँ बाँधती रहीं और उस मासूमियत की पाकिजा रौशनी में हर दुआ कुबूल होती महसूस होती रही वहीं डॉक्टर तनवीर की दरीयादिली के साथ की गई हर नेकी जो अक्सर वो वक्त बेवक्त हर जरूरतमंदों के लिए करते रहते हैं उसके कारण ऊपर वाले की नेमत भी बनी रहती है इनके पुरे परिवार पर ।

पर ये परिवार हमेशा ही अपने परिवार के साथ साथ पूरे समाज के लिए भी दुआएँ माँगते हैं और नेकदिली की मिशाल पैदा करते हैं । हमें भी इस परिवार से ये सिखना चाहिए कि हम सभी अपने लिए तो जरूर हीं जीते हैं और दुआ माँगते हैं पर वो दुआ जो दूसरों के हित के लिए भी माँगी जाए वो दुआ दुआ नहीं अल्लाह की इबादत बन जाती है ।

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