आरा स्थित जेल में माताओं के लिए तीन दिवसीय राजयोग कार्यक्रम।

आरा: प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय आरा के द्वारा त्रिदिवसीय राजयोग कार्यक्रम का आयोजन आरा स्थित जेल में किया गया। जिसमें प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा ब्रह्माकुमारी रूपा बहन जी और सुरभि बहन जी ने त्रिदिवसीय राजयोग में सर्वप्रथम आत्म अनुभूति कार्यक्रम में आत्मा के स्वधर्म, आत्मा के स्वरूप, आत्मा का स्वदेश, आत्मा के गुण, आत्मा के कर्तव्य,आत्मा के संस्कारों,आत्मा के सूक्ष्म शक्तियों, आत्मा के सर्व संबंध आत्मा के पिता परमपिता परमात्मा सदाशिव से कैसे जुड़े यह भी बताया की आत्मा में गुणों की कमी कैसे होती है और कैसे हम अपने आत्मा के गुणों का विकास कर सकते हैं और साथ ही साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह बताया की आत्मा सूक्ष्म अति सूक्ष्म शक्ति है और आत्माओं के अनादि अविनाशी पिता परमपिता परमात्मा सदाशिव भी भी सूक्ष्म अति सूक्ष्म ज्योति स्वरूप है जैसे आत्मा ज्योति स्वरूप वैसे आत्मा के पिता भी ज्योति स्वरूप है।

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जब आत्मा अपने आप को ज्योति स्वरूप जानकर समझकर अपना संबंध अपने अनादि अविनाशी परमपिता परमात्मा से जोड़ती है तो आत्मा में परमात्मा के गुण और संस्कार धीरे-धीरे जागृत होने लगते हैं। दूसरे शब्दों में कहां जाए तो आत्मा परमात्मा के गुणों का स्वरूप बनती है अर्थात आत्मा ज्ञान स्वरूप गुण स्वरूप और प्रेम स्वरूप आनंद स्वरूप बन जाती है। जब आत्मा पवित्र स्वरूप बनती है तब आत्मा के गुणों का विकास होने के साथ-साथ आत्मा के चरित्र में भी परिवर्तन आता है जिससे वह श्रेष्ठ चरित्र वाला और श्रेष्ठ समाज का निर्माण करने वाला श्रेष्ठ व्यक्ति बन जाता है।

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जब आत्मा को यह अनुभव होने लगता है की आत्मा परमात्मा की अनादि अविनाशी संतान है तब आत्मा के कर्मों में भी परिवर्तन आने लगता है विचारों में भी परिवर्तन आता है वाणी और व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आत्मा के संस्कारों में ही परिवर्तन आने लगता है जिससे एक श्रेष्ठ विश्व की संरचना का जो परमात्मा का दिव्य कर्तव्य है उसमें वह आत्माएं सहयोगी बन जाती हैं । दूसरे सत्र में आत्मा के अविनाशी परमपिता परमात्मा के बारे में बताया गया की परमपिता परमात्मा कौन हैं उनका स्वरूप क्या है?, उनका स्वधर्म क्या है?, उनके स्वदेश क्या है?, उनका उनका दिव्य कर्तव्य क्या है?, गुण क्या है? और कैसे परमपिता परमात्मा सदाशिव निराकार ज्योति बिंदु गीता ज्ञान दाता अपने श्रेष्ठ कर्तव्यों को करते हैं यह भी बताया गया। कैसे परमपिता परमात्मा प्रजापिता ब्रह्मा के तन के माध्यम के द्वारा दूसरे शब्दों में आदम के तन के द्वारा नई सृष्टि की स्थापना वर्तमान समय में सतयुगी सृष्टि सनातन संस्कृति की स्थापना कैसे परमात्मा शिव कर रहे हैं जो अभी बताया गया। गीता में कहा है। हे अर्जुन मेरा जन्म और कर्तव्य दिक श्रेष्ठ है। श्रीमद् भागवत गीता यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।


अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥
अर्थ: मै प्रकट होता हूं, मैं आता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढता है तब तब मैं आता हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता हूं और युगे युगे में जन्म लेता हूं। अर्थात दो युगों के संधि काल के समय (अर्थात कलयुग अंत और सतयुग आदि के पुरुषोत्तम संगम युग पर आकर 1. नर को नारायण और नारी को लक्ष्मी मनाने का दूसरे शब्दों में धर्म स्थापना करने के साथ 2. धर्म का विनाश करना और 3. साधु पुरुषों का उद्धार करने का यही समय है यही समय है और यही समय है) जब में साधारण मनुष्य के तन का आधार लेता हूं जिसका नाम प्रजापिता ब्रह्मा रखना और इसीलिए साधारण मनुष्य मुझे पहचान नहीं पाते।

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श्रीमद् भागवत गीता जी में यह भी कहा जाता है कि भगवान ने युद्ध कराया तो कौन सा युद्ध परमपिता परमात्मा ने कराया? जिसके लिए यह गायन है कि युद्ध में मरने पर अर्थात शरीर छोड़ने के बाद स्वर्ग जन्नत या पैराडाइज में स्वयं खुद ईश्वर, सर्वे का मालिक, गॉडफादर ले जाते हैं तो यह सबसे महत्वपूर्ण बात बताया गया कि कौन से युद्ध में अगर मनुष्य स्थिर होकर उसे युद्ध में प्रवीण बनाकर उसे युद्ध में विजई होता है तो परमात्मा कैसे उसे स्वर्ग धाम सुख का धाम दूसरे शब्दों में जन्नत और पैराडाइज में ले जाते हैं। यह सबसे जानने वाली महत्वपूर्ण बात है जिसमे बताया गया की मनोविकारों का युद्ध में जहां अच्छाई और बुराई का युद्ध जो निरंतर अपने अंदर चल रहे। सत्य और असत्य का युद्ध और परमात्मा और प्रकृति के विषय को अच्छी तरीके से समझा गया। की कैसे हम जब अपने आत्मा के अवगुणों पर विजय प्राप्त कर मन की चंचलता को त्याग कर आत्मा में निर्मलता और पवित्रता को धारण करे।

परमात्मा के गुणों और शक्तियों को धारण कर ही हम इस मनोविकारों के युद्ध में विजई होकर सतयुगी स्वर्ग पैराडाइस के राज्य अधिकारी दूसरे में कहा गया तो इसे ईश्वरीय सृष्टि दैवी सृष्टि के विश्व महाराजन और विश्व महारानी के रूप में हम राज भाग्य प्राप्त करे। शिव और शंकर के महान अंतर को बताया गया कि शिव शंकर क्या है और दोनों के कर्तव्यों का अंतर भी समझाया गया। तीसरे सत्र में यह बताया गया कि परमात्मा कैसी धरती पर अवतरित होकर हमें भारत के 84 जन्मो की कथा दूसरे शब्दों में नर से नारायण बनने की कथा, मनुष्य से देवता बनने की कथा, नारी से नारायणी बनने की कथा, भ्रष्टाचारी से श्रेष्ठाचारी बनने की कथा, पतित से पवन बनने की कथा, आत्मा रूपी सीता से पवित्र पार्वती बनने की कथा, असुर से सुर बनने की कथा,में बताया गया कि कैसे हम आसुरी प्रवृत्तियों से मुक्त होकर शॉप परिवर्तन से विश्व परिवर्तन का माध्यम बन कैसे हम इस धारा को स्वर्ग जन्नत और पैराडाइज बनाने से पहले अपने जीवन को स्वर्ग जन्नती पैराडाइज अर्थात पवित्र बनाएं। साथी साथ यह भी बताया गया कि भारत ही क्यों भगवान की “भूमि कहलाती है अर्थात भगवान भारत में ही क्यों आकर भारत का उद्धार करते हैं और भगवान किस धर्म की स्थापना अर्थ इस भारत भूमि पर कब आते हैं यह सबसे महत्वपूर्ण बात भी बताया क्या कि परमात्मा कैसे इस भारत भूमि पर अवतरण हो इस सृष्टि का महा परिवर्तन करते हैं और अन्य आत्माओं को जो परमात्मा के सहयोगी नहीं बनती उन्हें कैसे परमात्मा मुक्ति देते और जो आत्मा परमात्मा के सहयोगी बनती हैं उनका जीवन मुक्ति पद देकर इस सृष्टि को ही जीवन मुक्त सृष्टि दूसरे शब्दों में स्वर्ग जन्नत और पैराडाइज बनाते हैं। यह भी बताया गया बताया गया कि भारत वास्तव में परमात्मा परमपिता परमात्मा गीता ज्ञान दाता सदाशिव की “अवतरण भूमि” होने के कारण ही भारत में ही चार युगों में कैसे चक्र लगता है अर्थात भारत के उत्थान और पतन के 84 जनों को समझाया गया कि कैसे दैवी सृष्टि स्वर्ग, श्रेष्ठाचारी सृष्टि मनुष्य अर्थात देवी देवताओ के पतन होने से भारत का पतन अर्थात भारत श्रेष्ठाचारी सृष्टि कैसे मनोविकारों सृष्टि भ्रष्टाचारी सृष्टि कैसे बनती है यह भी बताया गया और कैसे हम परमात्मा को याद करें और कैसे हम भगवान की याद में ही भोजन को बनाकर भगवान को भोजन अर्पण करने के बाद उसे भोजन को भी पवित्र बनाकर जब हम उसका आहार ग्रहण करते हैं तो हमारे मनोवृतियों का कैसे परिवर्तन होता है यह भी बताएं क्या और कैसे हम परमात्मा की याद करें तो हमारे संस्कारों का कैसे परिवर्तन होगा अर्थात राज योग से अष्ट शक्तियों की प्राप्ति कैसे होती है यह भी बताया गया कि कैसे अपने आप को आत्मा समझ परमात्मा को हम याद करें तो इस विधि से ही परमात्मा की गुणों और शक्तियां हमारे जीवन में आती हैं जिसे हमारे संस्कारों का परिवर्तन होता है इसका अनुभव भी कराया गया।

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