कबीर की तरह अक्खड़ और फक्कड़ किंतु जीवंत कवि थे नागार्जुन

कबीर की तरह अक्खड़ और फक्कड़ किंतु जीवंत कवि थे नागार्जुन

पटना, २९ जून:  बाबा नागार्जुन एक जीवंत कवि थे। काव्य के पर्यायवाची थे। यह उनको देख कर ही समझा जा सकता था। संतकवि कबीर की तरह अक्खड़ और फक्कड़! खादी की मोटी धोती और गंजीनुमा कुर्ता! वह भी मोटे खादी का। बेतरतीब बिखरे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी और उसमें भी छोटा क़द ! उन्हें एक विचित्र सा, किंतु स्तुत्य व्यक्तित्व प्रदान करता था। एक निरन्तर गतिमान, महात्मा बुद्ध के “बहुजन हिताए,बहुजन सुखाए, लोकानुकंपाए, चरैवेति! चरैवेति!”…

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