राजनीति और परिवारबाद

परिवारबाद और वंशबाद की राजनीतिक धारा के बहाव पर और इस ओर उत्तरोत्तर बढता झुकाव पर राजनीति और समाज से जुड़े लोगों को चिंतन – मनन करने की आवश्यकता है। पर, इस मुद्धे को न तो राजनीतिज्ञ और न ही सामाजिक सरोकार रखने वाले गंभीरता से विचार कर रहे हैं। यही कारण है कि राजनीतिक सियायत में परिवारबाद और वंशबाद निरंतर ऊंचाईयां छू रही है। बिहार मे भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल से जुड़े राजनीति में ढेर सारे ऐसे राजनेता है जिनकों मौजूदा मुक़ाम तक पहुंचाने में पारिवारिक विरासत का बहुत बड़ा योगदान हैं। पर, हाल के दशकों में सियासत के सिरमौर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, जीतन राम मांझी, नरेंद्र सिंह और डॉ• सी• पी• ठाकुर जैसे राजनेता इसके दायरे में नहीं आते हैं। लेकिन, स्वयं हैसियत में आने के बाद, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को छोड़ प्राय: सभी वंशबाद के अनुयायी और अनुगामी बन गये हैं। वैसे, वक्त आने पर नीतीश कुमार भी उक्त राह के राही बन जाएं तो कोई अतिशयोक्ति नही होगा। फिलहाल जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार पुत्र मोह से दूर वंशवादी आरोप से मुक्त आदर्शवादी सिद्धांत का मार्ग दिखा रहे हैं। जिसे सियासत में मानने वाले बहुतेरे लोग नहीं हैं।
परिवारवाद और वंशवादी परंपरा को दरकिनार करने वाले बिहार केसरी डॉ• श्रीकृष्ण सिंह और फिर जन नायक कर्पूरी ठाकुर ने इस विकृति पर विराम लगाने का जो अतुलनीय प्रयास किया था, उसे किसी ने मिसाल के रूप में नहीं स्वीकार किया। हॉ• बीते 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में राजद के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व सांसद जगदानन्द सिंह ने पार्टी धर्म को सर्वोपरि और निष्ठापूर्वक मानकर अपने दलीय उम्मीदवार से पुत्र सुधाकर कुमार सिंह को पराजित कराया। लेकिन, वर्तमान विधान सभा चुनाव मे वह पुत्र सुधाकर सिंह को पार्टी के टिकट पर रामगढ़ विधान सभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनबा दिया है।
बिहार की उर्वरक राजनीतिक पृष्ठभूमि के अवलोकन से स्पष्ट है कि 1990 से पूर्व सूबे की राजनीति परिवारवाद कुछ खास सियासी परिवारों तक सिमटी थी।राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय के दायरे को बढाते हुए, इसे नया आयाम दिया । इसका दायरा इतना बन गया कि अब हर राजनीतिज्ञ यह सपना देखने और उसे मूर्तरुप देने के लिए तानाबाना बुनने लगते हैं।अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने के लिए हर कदम उठाने को तैयार रहते हैं। लालू प्रसाद ने यह कहते हुए सार्वजनिक मानदण्ड बना दिया कि पिता की विरासत पुत्र ही संभालता है। पुत्री को विरासत सौंपने के लिए उन्होंने कभी भी वाक्य विन्यास नहीं किया।
दरअसल, इस बार के विधान सभा चुनाव मे पिछले कई चुनावों की तरह वंशवाद का पिटारा खुल गया है। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने पिछले विधान सभा चुनाव मे एक साथ दोनों पत्रों को चुनाव मैदान में उतार दिया था। बड़े पुत्र तेजप्रताप यादव को महुआ और छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को राघोपुर विधान सभा क्षेत्र से लॉच किया था। दोनों को जीत मिली और नीतीश सरकार में उप मुख्यमंत्री और मंत्री पद तक सफर तय कर, फिर इस चुनाव मे मैदान मारने को बेताब है। इसके पहले ही बड़ी बेटी मीसा भारती को पाटलीपुत्र लोकसभा में उम्मीदवारी दी गयी थी। पर, प्रतिकुल परिस्थिति और नरेन्द्र मोदी की हवा मीसा भारती को लोकसभा की चौखट लॉघने से रोक दिया था। बाद में लालू ने मीसा भारती को राज्यसभा भेजकर अपनी मंशा फलीभूत की।
बिहार की राजनीति में परिवारवाद का पर्याय बने लोजपा के संस्थापक अध्यक्ष व केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान का कोई जवाब नहीं है। वह स्वयं के अलावा दोनों भाइयों पशुपति कुमार पारस और रामचन्द्र पासवान विधायक और सांसद बनवाने के बाद पुत्र चिराग पासवान को भी जमुई लोकसभा से प्रत्याशी बनाकर संसद की सीढ़ीयों को नमन करने भेज दिया । बह अभी लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और विधान सभा चुनाव मे चर्चा के केंद्र में हैं। साथ ही पिछले चुनाव में अनुज रामचन्द्र पासवान के पुत्र प्रिंस राज को समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर विधान सभा क्षेत्र से पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतार दिया था। लेकिन जदयू के महेश्वर हजारी से दामन छुड़ाने में कामयाबी हासिल नहीं हुई थी।
इस बीच सांसद रामचंद्र पासवान की मौत हो गयी। इससे रिक्त समस्तीपुर लोकसभा उपचुनाव में प्रिंस राज को उम्मीदवार बनाकर संसद भेज दिया। इधर, बिहार विधान सभा चुनाव मे राजग का नीतीश कुमार की सदारत वाली जदयू के सहारे हिस्सा बनने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री व हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने इमामगंज विधान सभा क्षेत्र से पर्चा दाखिल किया है तो दामाद देवेन्द्र मांझी ने मखदुमपुर और समधिन ज्योति मांझी को बाराचट्टी विधान सभा क्षेत्र से पार्टी की उम्मीदवारी दी गयी है। वैसे, इसके पहले ही हम प्रमुख की हैसियत में आने के बाद ही वह ‘ पुत्र मोह ‘ में घिर वंशवाद को बढ़ावा देने वालों में नामांकित करा लिया था। बीते विधान सभा चुनाव मे पुत्र संतोष कुमार सुमन को औरंगाबाद जिले के कुटुमबॉ विधान सभा क्षेत्र से पार्टी का उम्मीदवार बनाया था। पर, जीत का श्रेय नहीं लिख सका था। उसके बाद विधान सभा चुनाव मे पराजित पुत्र संतोष कुमार सुमन को राजद के सहयोग से बिहार विधान परिषद् के सदस्य बनाने में वो कामयाब रहे।
वज़ीरगंज के कांग्रेस विधायक अवधेश कुमार सिंह अपनी परम्परागत सीट से पुत्र शशिशेखर सिंह को पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतार दिया है। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के करीबी पूर्व केन्द्रीय मंत्री कांति सिंह के पुत्र ऋषि सिंह को औरंगाबाद जिले के ओबरा विधान सभा क्षेत्र से पार्टी का उम्मीदवारी मिली है। जबकि पूर्व केन्द्रीय मंत्री जय प्रकाश नारायण यादव की वेटी दिव्या प्रकाश को तारापुर विधान सभा और विधायक भाई विजय यादव को जमुई से पार्टी की उम्मीदवारी मिली है। कुख्यात रहे जेल में कैद पूर्व विधायक राजेन्द्र यादव के पुत्र अजय यादव को पार्टी के टिकट पर अतरी से प्रत्याशी बनाया गया है। जबकि इसी विधान सभा क्षेत्र से जदयू ने पूर्व विधान परिषद् सदस्य मनोरमा देवी को उम्मीदवार बनाया है। मनोरमा देवी दबंग व गया जिला परिषद् के अध्यक्ष रहे मरहूम बिंदी यादव की पत्नी हैं। उनके अनुज शीतल यादव ने वेलागंज विधान सभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनावी जंग जितने को वेताब हैं।
इधर, बलात्कार मामले में फरार चल रहे राजद विधायक अरूण यादव की पत्नी किरण देवी को पार्टी ने भोजपुर जिले के संदेश विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए उतार दिया है। लालू प्रसाद के करीबी राजद के कद्दाबर नेता व अलकतरा घोटाला के मुख्य अभियुक्त इलियास हुसैन की पुत्री डॉ• आसमां परवीन को जदयू ने वैशाली जिला के महुआ विधान सभा क्षेत्र में पार्टी का उम्मीदवार बनाया है। राजद नेता इलियास हुसैन से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहतर संबंध रहे हैं। बिहार विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष व कांग्रेस पार्टी के कहलगांव विधान सभा क्षेत्र से नौ बार विधायक रहे सदानंद सिंह ने अपने पुत्र शुभानंद मुकेश को अपने परंपरागत सीट कहलगांव से चुनावी जंग में उतार दिया है।

report by; anup narayan

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